•झारखंड का युवा असंतोष: JSSC-CGL और JPSC विवाद का सच, भ्रम और समाधान का रास्ता
• व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग करता स्वतः स्फूर्त आंदोलन और सरकार के लिए एक गंभीर सुधारवादी नीति का समय
वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया
पटना/झारखंड की वीर भूमि ऐतिहासिक रूप से शोषण के खिलाफ उलगुलान की गवाह रही है। आज एक बार फिर रांची का जयपाल सिंह मुंडा स्टेडियम युवाओं के एक नए और वैचारिक उलगुलान का केंद्र बन गया है। पिछले 14 दिनों से राज्य के विभिन्न कोनों से आए हजारों छात्र बुनियादी शैक्षणिक सुधारों, शिक्षक और छात्रवृत्ति संकट के साथ-साथ विशेष रूप से 14वीं JPSC और JSSC-CGL भर्ती परीक्षाओं में कथित धांधली, भ्रष्टाचार और पेपर लीक के खिलाफ सड़कों पर हैं। यह आंदोलन केवल परीक्षाओं को रद्द करने या पुनर्रचना की मांग तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस गहरे अविश्वास की अभिव्यक्ति है जो राज्य के युवाओं और उसकी परीक्षा प्रणालियों के बीच पैदा हो चुका है।
जब एक नौजवान अपनी जिंदगी के सबसे स्वर्णिम वर्ष बंद कमरों में किताबों के साथ गुजारता है, तो वह केवल एक नौकरी की तैयारी नहीं कर रहा होता, बल्कि वह अपने परिवार के सामाजिक और आर्थिक उत्थान का सपना बुन रहा होता है। लेकिन जब इन परीक्षाओं के परिणाम प्रशासनिक कमियों, कथित तौर पर बिना कट-ऑफ या ओएमआर शीट जारी किए शॉर्टलिस्टिंग करने और 'एजुकेशन माफिया' की संदेहास्पद भूमिका के कारण विवादों में घिर जाते हैं, तो वह सपना एक कड़वे दुःस्वप्न में बदल जाता है। छात्र नेता देवेंद्र नाथ महतो और राहुल क्रांति जैसे युवा जब अपनी जान जोखिम में डालकर अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल और अन्न-जल त्याग पर बैठते हैं, तो यह व्यवस्था की संवेदनशीलता पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न लगाता है।
भ्रम का कुहासा: राजनीतिक रंग बनाम छात्रों का वास्तविक दर्द
इस पूरे आंदोलन को लेकर सामाजिक और राजनैतिक गलियारों में कई तरह के भ्रम पैदा करने की कोशिश की जा रही है। सत्तापक्ष और विपक्ष दोनों ही इस संवेदनशील मुद्दे को अपने राजनैतिक नफे-नुकसान के चश्मे से देखने की भूल कर रहे हैं। जहां एक तरफ इसे विपक्ष द्वारा प्रायोजित या भड़काया हुआ आंदोलन बताकर इसके मूल उद्देश्यों को धुंधला करने का प्रयास किया जाता है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी दल इसे केवल चुनावी मुद्दा बनाकर सरकार को घेरने का हथियार मात्र समझ रहे हैं।
इस भ्रम के कुहासे को दूर करना बेहद जरूरी है। सच्चाई यह है कि यह किसी भी राजनीतिक दल द्वारा पोषित आंदोलन नहीं है। यह झारखंड के उन आम घरों के बच्चों का स्वतः स्फूर्त आंदोलन है जो बारिश में भी धान की रोपाई छोड़ अपनी हक और हिस्सेदारी की मांग को लेकर रांची की सड़कों पर भीग रहे हैं। जब ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (AISA) की राष्ट्रीय अध्यक्ष नेहा बोरा या अन्य छात्र संगठनों के प्रतिनिधि इस आंदोलन में शामिल होते हैं, तो वे युवाओं की उस सामूहिक पीड़ा को आवाज दे रहे होते हैं जो किसी दल विशेष की बपौती नहीं है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी द्वारा प्रदर्शनकारी छात्रों से फोन पर बात करना और खुद सत्ताधारी गठबंधन के भीतर से छात्रों की मदद की आवाज उठना यह साबित करता है कि यह संकट दलीय राजनीति से ऊपर उठकर एक गंभीर नीतिगत संकट बन चुका है।
चौरसिया ने कहा की छात्रों का गुस्सा किसी सरकार विशेष से ज्यादा उस सड़े-गले ढर्रे से है जो बार-बार परीक्षाओं को विवादों के घेरे में ला खड़ा करता है। जब छात्र 'JPSC में सीबीआई जांच लागू करो' और 'छात्र एकता जिंदाबाद' के नारे लगाते हैं, तो वे किसी राजनीतिक विचारधारा का झंडा नहीं उठा रहे होते, बल्कि वे अपने उस हक को मांग रहे होते हैं जो देश का संविधान उन्हें एक निष्पक्ष और पारदर्शी चयन प्रक्रिया के रूप में देता है। इसलिए इस आंदोलन को किसी भी प्रकार के राजनीतिक एजेंडे के तौर पर देखना उन युवाओं के संघर्ष का अपमान होगा जो अपने माता-पिता के गाढ़े पसीने की कमाई को फॉर्म भरने और लॉज का किराया देने में फूंक चुके हैं।
सरकार का स्टैंड: सराहनीय कदम पर विश्वास की कमी
इस बात से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की सरकार ने इस मामले को पूरी तरह से नजरअंदाज किया है। राज्य सरकार ने मामले की गंभीरता को देखते हुए झारखंड क्राइम इन्वेस्टिगेशन डिपार्टमेंट (CID) को जांच सौंपी है, जिसके तहत पूर्व JPSC चेयरमैन एल. खियांगते से पूछताछ हुई है और अब तक 19 से संदिग्धों की गिरफ्तारियां हो चुकी हैं। इसके अतिरिक्त, सरकार ने छात्रों की शिकायतों को सुनने और समाधान का रास्ता निकालने के लिए सुदिव्य कुमार के नेतृत्व में एक चार सदस्यीय उच्च स्तरीय समिति का गठन भी किया है।
लेकिन सवाल यह उठता है कि इन कदमों के बावजूद युवाओं का आक्रोश कम क्यों नहीं हो रहा? इसका मुख्य कारण सरकार के बयानों और धरातल की कार्रवाई के बीच का 'ट्रस्ट डेफिसिट' यानी विश्वास की कमी है। सरकार ने बातचीत के लिए समिति तो बना दी, लेकिन आंदोलन के 14वें दिन तक भी औपचारिक बातचीत के लिए समय, तारीख या स्थान का निर्धारण न करना प्रशासनिक सुस्ती को दर्शाता है। जब तक छात्र प्रतिनिधिमंडल के साथ सरकार की सीधी, आमने-सामने और लाइव पारदर्शिता के साथ बातचीत नहीं होगी, तब तक संदेह की दीवारें नहीं टूटेंगी।
मुख्यमंत्री का यह कहना कि 'सरकार सही समय पर निर्णय लेगी', उन छात्रों के धैर्य की परीक्षा लेने जैसा है जिनकी उम्र सीमा हर बीतते दिन के साथ समाप्त हो रही है। सरकार को समझना होगा कि उसका स्टैंड केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना या जांच एजेंसियों के भरोसे बैठना नहीं होना चाहिए। एक जनकल्याणकारी राज्य में सरकार का पहला कर्तव्य अपने नागरिकों, विशेषकर युवाओं के मन में यह भरोसा जगाना होता है कि उनके साथ अन्याय नहीं होने दिया जाएगा।
समाधान का मार्ग: एक सख्त और पारदर्शी नीति की आवश्यकता
झारखंड को इस परीक्षा संकट से बाहर निकालने और छात्रों के खोए हुए भरोसे को बहाल करने के लिए सरकार को तत्काल और दूरगामी दोनों स्तरों पर कड़े कदम उठाने होंगे। केवल आश्वासन या कछुआ गति से चलने वाली जांच से यह घाव भरने वाला नहीं है।
1. फास्ट-ट्रैक कोर्ट और सख्त कानूनी कार्रवाई
CID की जांच की गति को तेज करते हुए इस पूरे रैकेट के पीछे बैठे मुख्य सरगनाओं को बेनकाब करना होगा। सरकार को इसके लिए एक विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट का गठन करना चाहिए, ताकि परीक्षा में धांधली और ओएमआर शीट से छेड़छाड़ करने वाले अपराधियों को रिकॉर्ड समय में ऐसी कठोर सजा मिले जो भविष्य के लिए एक नजीर बन जाए। राज्य के 'एंटी-पेपर लीक कानून' की धाराओं को इतनी कड़ाई से लागू किया जाए कि कोई भी भ्रष्ट अधिकारी या बिचौलिया युवाओं के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने की सोच भी न सके।
2. परीक्षा प्रणाली का पूर्ण डिजिटल और तकनीकी आधुनिकीकरण
भविष्य की सभी परीक्षाओं को पूरी तरह से अभेद्य बनाने के लिए आधुनिक तकनीक का सहारा लेना अनिवार्य है। परीक्षा केंद्रों पर जैमर्स का उपयोग, पुख्ता बायोमेट्रिक वेरिफिकेशन और डिजिटल रूप से एन्क्रिप्टेड प्रश्नपत्रों की प्रणाली को लागू किया जाना चाहिए। इसके साथ ही, परीक्षा समाप्त होने के तुरंत बाद अभ्यर्थियों की रिस्पॉन्स शीट, कट-ऑफ मार्क्स और फाइनल ओएमआर डेटा को आधिकारिक वेबसाइट पर सार्वजनिक करना अनिवार्य किया जाए, ताकि किसी को भी पारदर्शिता पर उंगली उठाने का मौका न मिले।
3. संस्थागत सुधार और समयबद्ध कैलेंडर
JPSC और JSSC जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता को बहाल करने के लिए इसके प्रशासनिक ढांचे में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता है। इन आयोगों में ईमानदार, छवि-मुक्त और विशेषज्ञ अधिकारियों की नियुक्ति की जानी चाहिए। इसके साथ ही, यूपीएससी (UPSC) की तर्ज पर राज्य की परीक्षाओं का एक निश्चित, समयबद्ध वार्षिक कैलेंडर जारी हो और उसका सख्ती से पालन किया जाए, ताकि बार-बार परीक्षा टलने या रद्द होने के कारण छात्रों पर पड़ने वाले मानसिक और आर्थिक बोझ को कम किया जा सके।
4.सीधा और निरंतर संवाद
सरकार को बिना किसी और देरी के आंदोलनकारी छात्रों के 11 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल को टेबल पर बुलाना चाहिए। मुख्यमंत्री को खुद इस संवाद की कमान संभालनी चाहिए ताकि छात्रों को यह महसूस हो कि उनकी बात सीधे राज्य के मुखिया तक पहुंच रही है।
वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया ने कहा की झारखंड के युवाओं का यह आंदोलन किसी व्यवस्था को ध्वस्त करने की जिद नहीं है, बल्कि यह व्यवस्था को दुरुस्त करने की एक ईमानदार पुकार है। सरकार को इस आंदोलन को एक चुनौती के रूप में नहीं, बल्कि राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को साफ-सुथरा और सुदृढ़ बनाने के एक सुनहरे अवसर के रूप में देखना चाहिए। झारखंड का विकास तभी संभव है जब यहाँ का युवा वर्ग मानसिक रूप से निश्चिंत होकर, बिना किसी डर या भ्रष्टाचार के साये के, केवल अपनी योग्यता के दम पर देश निर्माण में योगदान दे सके। अब समय आ गया है कि सरकार अपनी संवेदनशीलता दिखाए, हठधर्मिता का त्याग करे और युवाओं के हित में एक ऐसा ऐतिहासिक स्टैंड ले जिससे झारखंड की परीक्षा प्रणाली पूरे देश के लिए पारदर्शिता का एक नया मॉडल बन सके।
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