कैसे 'चिप और शिप' के दम पर ग्लोबल मैन्युफैक्चरिंग सुपरपावर बन रहा है भारत

"सिलिकॉन के 'दिमाग' से समंदर के 'बाहुबल' तक: आधुनिक भारत निर्माण की महागाथा" 

                  वरिष्ठ पत्रकार चंदन चौरसिया 
पटना। कल तक जो भारत अपनी बुनियादी तकनीकों और रक्षा उपकरणों के लिए दुनिया के विकसित देशों का मुंह ताकता था, आज वह वैश्विक मंच पर अपनी आत्मनिर्भरता का डंका बजा रहा है। 21वीं सदी का नया भारत अब सिर्फ एक उपभोक्ता या 'बड़ा बाजार' बनकर संतुष्ट नहीं है; वह एक ग्लोबल प्रोड्यूसर (उत्पादक) और विनिर्माण का नया महाशक्ति बनने की राह पर चल पड़ा है। इस ऐतिहासिक बदलाव की सबसे जीवंत और साहसिक गवाही दे रहा है देश का नया संकल्प—"चिप से शिप तक" ।

यह केवल एक सरकारी नारा या औद्योगिक नीति नहीं है, बल्कि आधुनिक भारत की उस सामूहिक आकांक्षा की कहानी है जो एक तरफ मिलीमीटर आकार की सूक्ष्म 'सेमीकंडक्टर चिप' के डिजाइन में महारत हासिल कर रही है, तो दूसरी तरफ समंदर की लहरों को चीरने वाले 40 हजार टन के विशालकाय 'युद्धपोत और जहाजों' का निर्माण खुद अपने हाथों से कर रही है। आइए, सूक्ष्मता से लेकर विशालता के इस अभूतपूर्व सफर और भारत निर्माण की इस नई गाथा को विस्तार से समझते हैं।

1. 'चिप' यानी डिजिटल युग का नया सोना: भारत का तकनीकी पुनर्जागरण
आज की दुनिया में डेटा ही नया तेल है और सेमीकंडक्टर (चिप) वह रिफाइनरी है जो पूरी दुनिया को चला रही है। आपके हाथ में मौजूद स्मार्टफोन से लेकर, घर के स्मार्ट टीवी, सड़कों पर दौड़ती इलेक्ट्रिक कारें, और आसमान की सुरक्षा करते मिसाइल सिस्टम—इन सबका एक ही दिमाग है, और वह है सेमीकंडक्टर चिप। कोविड-19 महामारी के दौरान जब दुनिया ने 'चिप संकट' का सामना किया, तब भारत को समझ आया कि ताइवान या चीन जैसे गिने-चुने देशों पर इस तकनीक के लिए निर्भर रहना कितना बड़ा रणनीतिक जोखिम है। इसी जोखिम को भारत ने एक महा-अवसर में बदल दिया।

भारत सेमीकंडक्टर मिशन की क्रांति
भारत सरकार ने देश को वैश्विक सेमीकंडक्टर हब बनाने के लिए 76,000 करोड़ रुपये (लगभग 10 बिलियन डॉलर) के बजटीय आवंटन के साथ 'इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन' की शुरुआत की। इसका उद्देश्य भारत में ही चिप की डिजाइनिंग, फैब्रिकेशन (निर्माण), पैकेजिंग और टेस्टिंग का एक पूरा इकोसिस्टम तैयार करना है।

धोलेरा से असम तक: सिलिकॉन के नए गढ़
इस मिशन के तहत भारत के नक्शे पर नए औद्योगिक तीर्थस्थल उभर रहे हैं:

• गुजरात का धोलेरा: टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और ताइवान की पीएसएमसी मिलकर भारत का पहला वाणिज्यिक सेमीकंडक्टर फैब (मेगा फैब) स्थापित कर रहे हैं। यहाँ बनने वाली चिप्स ऑटोमोटिव, कंप्यूटिंग और कंज्यूमर इलेक्ट्रॉनिक्स की जरूरतों को पूरा करेंगी।

• साणंद (गुजरात) और असम (जगीरोड): यहाँ उन्नत स्तर के असेंबली और टेस्टिंग (एटीएमपी/ओएसएटी) प्लांट्स लगाए जा रहे हैं। अमेरिकी कंपनी माइक्रोन का साणंद प्लांट इस दिशा में एक मील का पत्थर है।

डिज़ाइन से विनिर्माण तक: भारत का नया माइंडसेट
पूरी दुनिया जानती है कि वैश्विक चिप डिजाइनिंग कंपनियों (जैसे इंटेल, क्वालकॉम, एनवीडिया) के बैक-ऑफिस और डिजाइन हब बेंगलुरु या हैदराबाद में हैं। यानी, दुनिया की चिप्स का दिमाग भारतीय इंजीनियर ही डिजाइन करते थे, लेकिन उसका मालिकाना हक और मैन्युफैक्चरिंग विदेशों में होती थी। अब भारत 'केवल डिजाइन' से आगे बढ़कर 'मेड इन इंडिया चिप' के निर्माण की तरफ बढ़ चुका है। यह रणनीतिक बदलाव भारत को तकनीकी रूप से संप्रभु बना रहा है।

2. 'शिप' यानी समंदर पर तिरंगे की धमक: नीली अर्थव्यवस्था का उदय
यदि चिप भारत के डिजिटल भविष्य का 'सूक्ष्म दिमाग' है, तो शिप (जहाज) भारत की आर्थिक और भू-राजनीतिक शक्ति का 'विशाल शरीर' हैं। भारत की लगभग 7,516 किलोमीटर लंबी तटीय रेखा और दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री व्यापार मार्गों के बीच इसकी भौगोलिक स्थिति इसे समंदर का स्वाभाविक राजा बनाती है। लेकिन दशकों तक भारत ने अपनी इस ताकत को नजरअंदाज किया। अब 'मैरीटाइम इंडिया विजन 2047' और 'सागरमाला परियोजना' के जरिए इस परिदृश्य को पूरी तरह बदला जा रहा है।

आईएनएस विक्रांत: स्वदेशी ताकत का तैरता हुआ किला
भारत निर्माण की शिपबिल्डिंग गाथा का सबसे गौरवशाली प्रतीक है आईएनएस विक्रांत यह भारत में निर्मित पहला स्वदेशी विमान वाहक पोत है। 262 मीटर लंबा, 62 मीटर चौड़ा और लगभग 45,000 टन वजनी यह तैरता हुआ हवाई अड्डा कोचीन शिपयार्ड में बनाया गया है। आईएनएस विक्रांत के निर्माण के साथ ही भारत दुनिया के उन चुनिंदा 5-6 देशों के एलीट क्लब में शामिल हो गया है, जिनके पास इतने विशाल और जटिल युद्धपोत बनाने की स्वदेशी क्षमता है।

कोचीन और मझगांव: आधुनिक जहाजरानी के केंद्र
• कोचीन शिपयार्ड लिमिटेड : यहाँ न केवल रक्षा जहाजों का निर्माण हो रहा है, बल्कि यह ग्रीन शिपिंग (हाइड्रोजन और इलेक्ट्रिक से चलने वाले जहाजों) की दिशा में भी वैश्विक ऑर्डर ले रहा है।

• मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स : मुंबई स्थित यह शिपयार्ड भारतीय नौसेना के लिए कलवरी क्लास की पनडुब्बियां और अत्याधुनिक स्टील्थ गाइडेड-मिसाइल डिस्ट्रॉयर (जैसे आईएनएस इम्फाल, आईएनएस सूरत) का निर्माण कर रहा है।

व्यावसायिक शिपबिल्डिंग में वैश्विक हिस्सेदारी का लक्ष्य
भारत का लक्ष्य सिर्फ अपनी नौसेना को मजबूत करना नहीं है, बल्कि दुनिया के कमर्शियल शिपबिल्डिंग मार्केट (मालवाहक जहाजों के निर्माण) में अपनी हिस्सेदारी को मौजूदा 1% से बढ़ाकर शीर्ष 5 देशों में शामिल होना है। इसके लिए सरकार 'शिपबिल्डिंग फाइनेंशियल असिस्टेंस पॉलिसी' जैसी नीतियां लेकर आई है, जिससे घरेलू कंपनियों को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाया जा सके।

3. यूनिक कन्वर्जेंस: जब 'चिप' मिलती है 'शिप' से
इस आर्टिकल का सबसे अनोखा और विचारणीय पहलू यह है कि चिप और शिप दो अलग-अलग ध्रुव नहीं हैं, बल्कि ये एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

आज का एक आधुनिक व्यावसायिक जहाज या नौसैनिक युद्धपोत सिर्फ लोहे का एक विशाल ढांचा नहीं होता। वह पानी पर तैरता हुआ एक 'सुपरकंप्यूटर' होता है। एक आधुनिक विध्वंसक जहाज में रडार सिस्टम, सोनार, गाइडेड मिसाइल कंट्रोल, ऑटोमेशन नेविगेशन और कम्युनिकेशन के लिए लाखों की संख्या में माइक्रोचिप्स और सेंसर्स की आवश्यकता होती है।

जब तक भारत इन चिप्स के लिए ताइवान या अमेरिका पर निर्भर था, तब तक हमारे जहाजों की सुरक्षा भी पूरी तरह स्वदेशी नहीं कही जा सकती थी। लेकिन अब, जब भारत धोलेरा में अपनी चिप बनाएगा और कोचीन में अपना शिप, तब भारत के स्वदेशी जहाजों के भीतर भारत का ही 'स्वदेशी दिमाग' धड़केगा। सूक्ष्म और स्थूल का यह मिलन ही वास्तविक 'आत्मनिर्भर भारत' की रीढ़ है।

4. अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति पर इसका क्रांतिकारी असर
'चिप से शिप' तक की इस यात्रा का प्रभाव सिर्फ फैक्ट्रियों और बंदरगाहों तक सीमित नहीं है, इसका सीधा असर देश के आम नागरिक और वैश्विक कूटनीति पर पड़ रहा है।

• लाखों नौकरियों का सृजन: सेमीकंडक्टर फैब और शिपयार्ड, दोनों ही अत्यधिक श्रम और पूंजी वाले क्षेत्र हैं। एक चिप प्लांट लगने से उसके आसपास सैकड़ों सहायक उद्योग (रसायन, गैसें, टेस्टिंग लैब) विकसित होते हैं। वहीं एक जहाज के निर्माण में स्टील, पेंट, केबलिंग जैसी हजारों एमएसएमई को काम मिलता है। इससे देश के युवाओं के लिए उच्च-तकनीकी और कुशल रोजगार के लाखों अवसर पैदा हो रहे हैं।

• विदेशी मुद्रा की भारी बचत: भारत हर साल अरबों डॉलर के इलेक्ट्रॉनिक्स, चिप्स और जहाजों का आयात करता है। घरेलू विनिर्माण बढ़ने से देश का चालू खाता घाटा कम होगा और रुपया मजबूत होगा।

• भू-राजनीतिक ढाल : हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता के बीच, भारत का समुद्री और तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर होना बेहद जरूरी है। 'चिप से शिप' की यह प्रगति भारत को 'क्वाड' और वैश्विक मंचों पर एक मजबूत रणनीतिक साझेदार के रूप में स्थापित करती है।

5. चुनौतियाँ अभी बाकी हैं: आत्मनिर्भरता का कांटों भरा रास्ता
गाथा जितनी शानदार है, उसकी राह उतनी ही चुनौतीपूर्ण है। भारत को यदि इस सफर को सफल बनाना है, तो कुछ मोर्चों पर लगातार काम करना होगा:

1. अबाधित संसाधन : सेमीकंडक्टर प्लांट्स को 24 घंटे बिना किसी उतार-चढ़ाव के बिजली और लाखों लीटर शुद्ध पानी की आवश्यकता होती है। इसके लिए विश्वस्तरीय बुनियादी ढांचा बनाए रखना होगा।

2. कुशल कार्यबल : चिप निर्माण और उन्नत नौसेना इंजीनियरिंग के लिए देश के शिक्षण संस्थानों (आईआईटी, एनआईटी) को अपने पाठ्यक्रमों को वैश्विक स्तर के अनुरूप अपग्रेड करना होगा।

3. लगातार नवाचार : तकनीक हर छह महीने में बदल जाती है। भारत को केवल नकल करने के बजाय अनुसंधान और विकास में भारी निवेश करना होगा ताकि हम तकनीक में हमेशा एक कदम आगे रहें।

निष्कर्ष: एक नए महाशक्ति का उदयकाल
'चिप से शिप' तक की यह गाथा इस बात का साक्षात प्रमाण है कि भारत अब अपनी पुरानी कछुआ गति को छोड़कर 'चीते की रफ्तार' से आगे बढ़ने का मन बना चुका है। सूक्ष्म नैनोमीटर की चिप से लेकर समंदर की लहरों पर राज करने वाले महाकाय जहाजों तक का यह सफर भारत की वैज्ञानिक मेधा, राजनीतिक इच्छाशक्ति और औद्योगिक कौशल का एक अद्भुत कोलाज है।

यह 21वीं सदी का वह भारत है जो अपनी नियति खुद लिख रहा है। जब आने वाले समय में दुनिया के स्मार्टफोन भारतीय चिप से चलेंगे और दुनिया का व्यापार भारतीय जहाजों के जरिए सुरक्षित होगा, तब इतिहासकार लिखेंगे कि कैसे भारत ने शून्य से शुरुआत करके 'चिप से शिप' तक आत्मनिर्भरता का एक नया स्वर्णिम अध्याय लिखा था। यह सिर्फ एक औद्योगिक प्रगति नहीं है, यह एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में भारत का पुनरुत्थान है।

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